॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 12.9.33
तावत् स भगवान् साक्षाद् योगाधीशो गुहाशयः।
अन्तर्दध ऋषेः सद्यो यथेहानीशनिर्मिता॥ ३३
tāvat sa bhagavān sākṣād yogādhīśo guhāśayaḥ|
antardadha ṛṣeḥ sadyo yathehānīśanirmitā|| 33
अर्थ
परन्तु शौनकजी! भगवान् केवल योगियोंके ही नहीं, स्वयं योगके भी स्वामी और सबके हृदयमें छिपे रहनेवाले हैं। अभी मार्कण्डेय मुनि उनके पास पहुँच भी न पाये थे कि वे तुरंत अन्तर्धान हो गये—ठीक वैसे ही, जैसे अभागे और असमर्थ पुरुषोंके परिश्रमका पता नहीं चलता कि वह फल दिये बिना ही क्या हो गया?॥ ३३॥