भाईके सामने ही कानोंमें बाणके समान लगनेवाले इन अत्यन्त कठोर वचनोंसे मर्माहत होकर भी विदुरजीने कुछ बुरा न माना और भगवान्की मायाको प्रबल समझकर अपना धनुष राजद्वारपर रख वे हस्तिनापुरसे चल दिये॥ १६॥✎ 1831841851584
स इत्थमत्युल्बणकर्णबाणै-
र्भ्रातुः पुरो मर्मसु ताडितोऽपि।
स्वयं धनुर्द्वारि निधाय मायां
गतव्यथोऽयादुरु मानयानः॥ १६
भाईके सामने ही कानोंमें बाणके समान लगनेवाले इन अत्यन्त कठोर वचनोंसे मर्माहत होकर भी विदुरजीने कुछ बुरा न माना और भगवान्की मायाको प्रबल समझकर अपना धनुष राजद्वारपर रख वे हस्तिनापुरसे चल दिये॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.1.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 237) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/1/16/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)