श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.1.17

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

स निर्गतः कौरवपुण्यलब्धो

गजाह्वयात्तीर्थपदः पदानि।

अन्वाक्रमत्पुण्यचिकीर्षयोर्व्यां

स्वधिष्ठितो यानि सहस्रमूर्तिः॥ १७

sa nirgataḥ kauravapuṇyalabdho

gajāhvayāttīrthapadaḥ padāni|

anvākramatpuṇyacikīrṣayorvyāṃ

svadhiṣṭhito yāni sahasramūrtiḥ|| 17

अर्थ

कौरवोंको विदुर-जैसे महात्मा बड़े पुण्यसे प्राप्त हुए थे। वे हस्तिनापुरसे चलकर पुण्य करनेकी इच्छासे भूमण्डलमें तीर्थपाद भगवान्‌के क्षेत्रोंमें विचरने लगे, जहाँ श्रीहरि, ब्रह्मा, रुद्र, अनन्त आदि अनेकों मूर्तियोंके रूपमें विराजमान हैं॥ १७॥✎ 183 184 185 1584

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #183 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #184 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #185 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1584 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: अवधूत-वेषमें → अवधूतवेषमें

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