श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.1.18

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

पुरेषु पुण्योपवनाद्रिकुञ्जे-

ष्वपङ्कतोयेषु सरित्सरःसु।

अनन्तलिङ्गैः समलङ्कृतेषु

चचार तीर्थायतनेष्वनन्यः॥ १८

pureṣu puṇyopavanādrikuñje-

ṣvapaṅkatoyeṣu saritsaraḥsu|

anantaliṅgaiḥ samalaṅkṛteṣu

cacāra tīrthāyataneṣvananyaḥ|| 18

अर्थ

जहाँ-जहाँ भगवान्‌की प्रतिमाओंसे सुशोभित तीर्थस्थान, नगर, पवित्र वन, पर्वत, निकुंज और निर्मल जलसे भरे हुए नदी-सरोवर आदि थे, उन सभी स्थानोंमें वे अकेले ही विचरते रहे॥ १८॥✎ 183 184 185 1584

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #183 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #184 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #185 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1584 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: अवधूत-वेषमें → अवधूतवेषमें

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