श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.1.19

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

गां पर्यटन्मेध्यविविक्तवृत्तिः

सदाऽऽप्लुतोऽधःशयनोऽवधूतः ।

अलक्षितः स्वैरवधूतवेषो

व्रतानि चेरे हरितोषणानि॥ १९

gāṃ paryaṭanmedhyaviviktavṛttiḥ

sadā''pluto'dhaḥśayano'vadhūtaḥ |

alakṣitaḥ svairavadhūtaveṣo

vratāni cere haritoṣaṇāni|| 19

अर्थ

वे अवधूतवेषमें स्वच्छन्दतापूर्वक पृथ्वीपर विचरते थे, जिससे आत्मीयजन उन्हें पहचान न सकें। वे शरीरको सजाते न थे, पवित्र और साधारण भोजन करते, शुद्धवृत्तिसे जीवन-निर्वाह करते, प्रत्येक तीर्थमें स्नान करते, जमीनपर सोते और भगवान्‌को प्रसन्‍न करनेवाले व्रतोंका पालन करते रहते थे॥ १९॥✎ 183 184 185 1584

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #183 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #184 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #185 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1584 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: अवधूत-वेषमें → अवधूतवेषमें

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें