श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.1.34

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

अपिस्विदास्ते भगवान् सुखं वो

यः सात्वतां कामदुघोऽनिरुद्धः।

यमामनन्ति स्म ह शब्दयोनिं

मनोमयं सत्त्वतुरीयतत्त्वम्॥ ३४

apisvidāste bhagavān sukhaṃ vo

yaḥ sātvatāṃ kāmadugho'niruddhaḥ|

yamāmananti sma ha śabdayoniṃ

manomayaṃ sattvaturīyatattvam|| 34

अर्थ

आप भक्तजनोंकी कामनाएँ पूर्ण करनेवाले भगवान् अनिरुद्धजी सुखपूर्वक हैं न, जिन्हें शास्त्र वेदोंके आदिकारण और अन्तःकरणचतुष्टयके चौथे अंश मनके अधिष्ठाता बतलाते हैं*॥ ३४॥✎ 187 1295 1296

टिप्पणियाँ

  1. *

    चित्त, अहंकार, बुद्धि और मन—ये अन्तःकरणके चार अंश हैं। इनके अधिष्ठाता क्रमशः वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध हैं।

    (मुद्रित पृष्ठ 239)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #187 शब्दोंके बीचका स्थान: विष्णु-भगवान् की → विष्णु-भगवान्‌की
  • #1295 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): विष्णु-भगवान्‌की → विष्णुभगवान्‌की
  • #1296 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): स्वामि-कार्तिक → स्वामिकार्तिक

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