श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.1.35

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

अपिस्विदन्ये च निजात्मदैव-

मनन्यवृत्त्या समनुव्रता ये।

हृदीकसत्यात्मजचारुदेष्ण-

गदादयः स्वस्ति चरन्ति सौम्य॥ ३५

apisvidanye ca nijātmadaiva-

mananyavṛttyā samanuvratā ye|

hṛdīkasatyātmajacārudeṣṇa-

gadādayaḥ svasti caranti saumya|| 35

अर्थ

सौम्यस्वभाव उद्धवजी! अपने हृदयेश्‍वर भगवान् श्रीकृष्णका अनन्यभावसे अनुसरण करनेवाले जो हृदीक, सत्यभामानन्दन चारुदेष्ण और गद आदि अन्य भगवान्‌के पुत्र हैं, वे सब भी कुशलपूर्वक हैं न?॥ ३५॥✎ 187 1295 1296

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #187 शब्दोंके बीचका स्थान: विष्णु-भगवान् की → विष्णु-भगवान्‌की
  • #1295 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): विष्णु-भगवान्‌की → विष्णुभगवान्‌की
  • #1296 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): स्वामि-कार्तिक → स्वामिकार्तिक

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