श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.1.40

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

अहो पृथापि ध्रियतेऽर्भकार्थे

राजर्षिवर्येण विनापि तेन।

यस्त्वेकवीरोऽधिरथो विजिग्ये

धनुर्द्वितीयः ककुभश्‍चतस्रः॥ ४०

aho pṛthāpi dhriyate'rbhakārthe

rājarṣivaryeṇa vināpi tena|

yastvekavīro'dhiratho vijigye

dhanurdvitīyaḥ kakubhaścatasraḥ|| 40

अर्थ

अहो! बेचारी कुन्ती तो राजर्षिश्रेष्ठ पाण्डुके वियोगमें मृतप्राय-सी होकर भी इन बालकोंके लिये ही प्राण धारण किये हुए है। रथियोंमें श्रेष्ठ महाराज पाण्डु ऐसे अनुपम वीर थे कि उन्होंने केवल एक धनुष लेकर ही अकेले चारों दिशाओंको जीत लिया था॥ ४०॥✎ 188

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #188 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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