श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.1.41

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

सौम्यानुशोचे तमधःपतन्तं

भ्रात्रे परेताय विदुद्रुहे यः।

निर्यापितो येन सुहृत्स्वपुर्या

अहं स्वपुत्रान् समनुव्रतेन॥ ४१

saumyānuśoce tamadhaḥpatantaṃ

bhrātre paretāya vidudruhe yaḥ|

niryāpito yena suhṛtsvapuryā

ahaṃ svaputrān samanuvratena|| 41

अर्थ

सौम्यस्वभाव उद्धवजी! मुझे तो अधःपतनकी ओर जानेवाले उन धृतराष्ट्रके लिये बार-बार शोक होता है, जिन्होंने पाण्डवोंके रूपमें अपने परलोकवासी भाई पाण्डुसे ही द्रोह किया तथा अपने पुत्रोंकी हाँ-में-हाँ मिलाकर अपने हितचिन्तक मुझको भी नगरसे निकलवा दिया॥ ४१॥✎ 188

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #188 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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