॥ श्रीहरिः ॥
अथ दशमोऽध्यायः
दस प्रकारकी सृष्टिका वर्णन
विदुर उवाच
अन्तर्हिते भगवति ब्रह्मा लोकपितामहः।
प्रजाः ससर्ज कतिधा दैहिकीर्मानसीर्विभुः॥ १
antarhite bhagavati brahmā lokapitāmahaḥ|
prajāḥ sasarja katidhā daihikīrmānasīrvibhuḥ|| 1
अर्थ
विदुरजीने कहा—मुनिवर! भगवान् नारायणके अन्तर्धान हो जानेपर सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ब्रह्माजीने अपने देह और मनसे कितने प्रकारकी सृष्टि उत्पन्न की?॥ १॥
अन्तर्हिते भगवति ब्रह्मा लोकपितामहः।
प्रजाः ससर्ज कतिधा दैहिकीर्मानसीर्विभुः॥ १
विदुरजीने कहा—मुनिवर! भगवान् नारायणके अन्तर्धान हो जानेपर सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ब्रह्माजीने अपने देह और मनसे कितने प्रकारकी सृष्टि उत्पन्न की?॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.10.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 278) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/10/1/