श्रीमैत्रेयजीने कहा—विषयोंका रूपान्तर (बदलना) ही कालका आकार है। स्वयं तो वह निर्विशेष, अनादि और अनन्त है। उसीको निमित्त बनाकर भगवान् खेल-खेलमें अपने-आपको ही सृष्टिके रूपमें प्रकट कर देते हैं॥ ११॥✎ 242243244245
गुणव्यतिकराकारो निर्विशेषोऽप्रतिष्ठितः।
पुरुषस्तदुपादानमात्मानं लीलयासृजत्॥ ११
श्रीमैत्रेयजीने कहा—विषयोंका रूपान्तर (बदलना) ही कालका आकार है। स्वयं तो वह निर्विशेष, अनादि और अनन्त है। उसीको निमित्त बनाकर भगवान् खेल-खेलमें अपने-आपको ही सृष्टिके रूपमें प्रकट कर देते हैं॥ ११॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.10.11 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 279) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/10/11/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
#242 शब्दोंके बीचका स्थान: सृष्टियोंकाभी → सृष्टियोंका भी