अनेन लोकान् प्राग्लीनान् कल्पितास्मीत्यचिन्तयत्॥ ७
tadvilokya viyadvyāpi puṣkaraṃ yadadhiṣṭhitam|
anena lokān prāglīnān kalpitāsmītyacintayat|| 7
अर्थ
फिर जिसपर स्वयं बैठे हुए थे, उस आकाशव्यापी कमलको देखकर उन्होंने विचार किया कि ‘पूर्वकल्पमें लीन हुए लोकोंको मैं इसीसे रचूँगा’॥ ७॥
तद्विलोक्य वियद्व्यापि पुष्करं यदधिष्ठितम्।
अनेन लोकान् प्राग्लीनान् कल्पितास्मीत्यचिन्तयत्॥ ७
फिर जिसपर स्वयं बैठे हुए थे, उस आकाशव्यापी कमलको देखकर उन्होंने विचार किया कि ‘पूर्वकल्पमें लीन हुए लोकोंको मैं इसीसे रचूँगा’॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.10.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 278) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/10/7/