श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.11.21

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

धर्मश्‍चतुष्पान्मनुजान् कृते समनुवर्तते।

स एवान्येष्वधर्मेण व्येति पादेन वर्धता॥ २१

dharmaścatuṣpānmanujān kṛte samanuvartate|

sa evānyeṣvadharmeṇa vyeti pādena vardhatā|| 21

अर्थ

सत्ययुगके मनुष्योंमें धर्म अपने चारों चरणोंसे रहता है; फिर अन्य युगोंमें अधर्मकी वृद्धि होनेसे उसका एक-एक चरण क्षीण होता जाता है॥ २१॥✎ 246 247

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #246 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #247 शब्दोंके बीचका स्थान: २४॥यह → २४॥ यह

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