श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.11.22

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

त्रिलोक्या युगसाहस्रं बहिराब्रह्मणो दिनम्।

तावत्येव निशा तात यन्‍निमीलति विश्‍वसृक्२॥ २२

trilokyā yugasāhasraṃ bahirābrahmaṇo dinam|

tāvatyeva niśā tāta yannimīlati viśvasṛk|| 22

अर्थ

प्यारे विदुरजी! त्रिलोकीसे बाहर महर्लोकसे ब्रह्मलोकपर्यन्त यहाँकी एक सहस्र चतुर्युगीका एक दिन होता है और इतनी ही बड़ी रात्रि होती है, जिसमें जगत‍्कर्ता ब्रह्माजी शयन करते हैं॥ २२॥✎ 246 247

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—दृक्।

    (मुद्रित पृष्ठ 284)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #246 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #247 शब्दोंके बीचका स्थान: २४॥यह → २४॥ यह

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