विदुरजी! इस समय जो कल्प चल रहा है, वह दूसरे परार्धका आरम्भक बतलाया जाता है। यह वाराहकल्प-नामसे विख्यात है, इसमें भगवान्ने सूकररूप धारण किया था॥ ३६॥✎ 248
अयं तु कथितः कल्पो द्वितीयस्यापि भारत।
वाराह इति विख्यातो यत्रासीत्सूकरो हरिः॥ ३६
विदुरजी! इस समय जो कल्प चल रहा है, वह दूसरे परार्धका आरम्भक बतलाया जाता है। यह वाराहकल्प-नामसे विख्यात है, इसमें भगवान्ने सूकररूप धारण किया था॥ ३६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.11.36 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 286) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/11/36/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)