श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.13.22

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

दृष्टोऽङ्गुष्ठशिरोमात्रः क्षणाद्गण्डशिलासमः।

अपि स्विद्भगवानेष यज्ञो मे खेदयन्मनः॥ २२

dṛṣṭo'ṅguṣṭhaśiromātraḥ kṣaṇādgaṇḍaśilāsamaḥ|

api svidbhagavāneṣa yajño me khedayanmanaḥ|| 22

अर्थ

पहले तो यह अँगूठेके पोरुएके बराबर दिखायी देता था, किन्तु एक क्षणमें ही बड़ी भारी शिलाके समान हो गया। अवश्य ही यज्ञमूर्ति भगवान् हमलोगोंके मनको मोहित कर रहे हैं॥ २२॥✎ 254

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #254 शब्दोंके बीचका स्थान: वराहभगवान् की → वराहभगवान्‌की

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