ब्रह्माजी और उनके पुत्र इस प्रकार सोच ही रहे थे कि भगवान् यज्ञपुरुष पर्वताकार होकर गरजने लगे॥ २३॥✎ 254
इति मीमांसतस्तस्य ब्रह्मणः सह सूनुभिः।
भगवान् यज्ञपुरुषो जगर्जागेन्द्रसन्निभः॥ २३
ब्रह्माजी और उनके पुत्र इस प्रकार सोच ही रहे थे कि भगवान् यज्ञपुरुष पर्वताकार होकर गरजने लगे॥ २३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.13.23 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 294) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/13/23/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#254 शब्दोंके बीचका स्थान: वराहभगवान् की → वराहभगवान्की