भगवान्के स्वरूपका वेदोंमें विस्तारसे वर्णन किया गया है; अतः उन मुनीश्वरोंने जो स्तुति की, उसे वेदरूप मानकर भगवान् बड़े प्रसन्न हुए और एक बार फिर गरजकर देवताओंके हितके लिये गजराजकी-सी लीला करते हुए जलमें घुस गये॥ २६॥✎ 254
तेषां सतां वेदवितानमूर्ति-
र्ब्रह्मावधार्यात्मगुणानुवादम् ।
विनद्य भूयो विबुधोदयाय
गजेन्द्रलीलो जलमाविवेश॥ २६
भगवान्के स्वरूपका वेदोंमें विस्तारसे वर्णन किया गया है; अतः उन मुनीश्वरोंने जो स्तुति की, उसे वेदरूप मानकर भगवान् बड़े प्रसन्न हुए और एक बार फिर गरजकर देवताओंके हितके लिये गजराजकी-सी लीला करते हुए जलमें घुस गये॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.13.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 294) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/13/26/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#254 शब्दोंके बीचका स्थान: वराहभगवान् की → वराहभगवान्की