श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.13.27

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

उत्क्षिप्तवालः खचरः कठोरः

सटा विधुन्वन् खररोमशत्वक्।

खुराहताभ्रः सितदंष्ट्र ईक्षा-

ज्योतिर्बभासे भगवान्महीध्रः॥ २७

utkṣiptavālaḥ khacaraḥ kaṭhoraḥ

saṭā vidhunvan khararomaśatvak|

khurāhatābhraḥ sitadaṃṣṭra īkṣā-

jyotirbabhāse bhagavānmahīdhraḥ|| 27

अर्थ

पहले वे सूकररूप भगवान् पूँछ उठाकर बड़े वेगसे आकाशमें उछले और अपनी गर्दनके बालोंको फटकारकर खुरोंके आघातसे बादलोंको छितराने लगे। उनका शरीर बड़ा कठोर था, त्वचापर कड़े-कड़े बाल थे, दाढ़ें सफेद थीं और नेत्रोंसे तेज निकल रहा था, उस समय उनकी बड़ी शोभा हो रही थी॥ २७॥

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