श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.13.28

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

घ्राणेन पृथ्व्याः पदवीं विजिघ्रन्

क्रोडापदेशः स्वयमध्वराङ्गः।

करालदंष्ट्रोऽप्यकरालदृग्भ्या-

मुद्वीक्ष्य विप्रान् गृणतोऽविशत्कम्॥ २८

ghrāṇena pṛthvyāḥ padavīṃ vijighran

kroḍāpadeśaḥ svayamadhvarāṅgaḥ|

karāladaṃṣṭro'pyakarāladṛgbhyā-

mudvīkṣya viprān gṛṇato'viśatkam|| 28

अर्थ

भगवान् स्वयं यज्ञपुरुष हैं तथापि सूकररूप धारण करनेके कारण अपनी नाकसे सूँघ-सूँघकर पृथ्वीका पता लगा रहे थे। उनकी दाढ़ें बड़ी कठोर थीं। इस प्रकार यद्यपि वे बड़े क्रूर जान पड़ते थे, तथापि अपनी स्तुति करनेवाले मरीचि आदि मुनियोंकी ओर बड़ी सौम्य दृष्टिसे निहारते हुए उन्होंने जलमें प्रवेश किया॥ २८॥

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