श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.13.30

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

खुरैः क्षुरप्रैर्दरयंस्तदाऽऽप

उत्पारपारं त्रिपरू रसायाम्।

ददर्श गां तत्र सुषुप्सुरग्रे

यां जीवधानीं स्वयमभ्यधत्त॥ ३०

khuraiḥ kṣuraprairdarayaṃstadā''pa

utpārapāraṃ triparū rasāyām|

dadarśa gāṃ tatra suṣupsuragre

yāṃ jīvadhānīṃ svayamabhyadhatta|| 30

अर्थ

तब भगवान् यज्ञमूर्ति अपने बाणके समान पैने खुरोंसे जलको चीरते हुए उस अपार जलराशिके उस पार पहुँचे। वहाँ रसातलमें उन्होंने समस्त जीवोंकी आश्रयभूता पृथ्वीको देखा, जिसे कल्पान्तमें शयन करनेके लिये उद्यत श्रीहरिने स्वयं अपने ही उदरमें लीन कर लिया था॥ ३०॥

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