श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.13.31

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

स्वद्रंष्ट्रयोद‍्धृत्य महीं निमग्नां

स उत्थितः संरुरुचे रसायाः।

तत्रापि दैत्यं गदयाऽऽपतन्तं

सुनाभसन्दीपिततीव्रमन्युः ॥ ३१

svadraṃṣṭrayoddhṛtya mahīṃ nimagnāṃ

sa utthitaḥ saṃruruce rasāyāḥ|

tatrāpi daityaṃ gadayā''patantaṃ

sunābhasandīpitatīvramanyuḥ || 31

अर्थ

फिर वे जलमें डूबी हुई पृथ्वीको अपनी दाढ़ोंपर लेकर रसातलसे ऊपर आये। उस समय उनकी बड़ी शोभा हो रही थी। जलसे बाहर आते समय उनके मार्गमें विघ्न डालनेके लिये महापराक्रमी हिरण्याक्षने जलके भीतर ही उनपर गदासे आक्रमण किया। इससे उनका क्रोध चक्रके समान तीक्ष्ण हो गया और उन्होंने उसे लीलासे ही इस प्रकार मार डाला, जैसे सिंह हाथीको मार डालता है। उस समय उसके रक्तसे थूथनी तथा कनपटी सन जानेके कारण वे ऐसे जान पड़ते थे मानो कोई गजराज लाल मिट्टीके टीलेमें टक्कर मारकर आया हो॥ ३१-३२॥

यह अर्थ श्लोक 31–32 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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