श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.13.37

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

दीक्षानुजन्मोपसदः३ शिरोधरं

त्वं प्रायणीयोदयनीयदंष्ट्रः।✎ 1883

जिह्वा प्रवर्ग्यस्तव४ शीर्षकं क्रतोः

सभ्यावसथ्यं चितयोऽस५वो हि ते॥ ३७

dīkṣānujanmopasadaḥ śirodharaṃ

tvaṃ prāyaṇīyodayanīyadaṃṣṭraḥ|

jihvā pravargyastava śīrṣakaṃ kratoḥ

sabhyāvasathyaṃ citayo'savo hi te|| 37

अर्थ

बार-बार अवतार लेना यज्ञस्वरूप आपकी दीक्षणीय इष्टि है, गरदन उपसद (तीन इष्टियाँ) हैं; दोनों दाढ़ें प्रायणीय (दीक्षाके बादकी इष्टि) और उदयनीय (यज्ञसमाप्तिकी इष्टि) हैं; जिह्वा प्रवर्ग्य (प्रत्येक उपसदके पूर्व किया जानेवाला महावीर नामक कर्म) है, सिर सभ्य (होमरहित अग्‍नि) और आवसथ्य (औपासनाग्‍नि) हैं तथा प्राण चिति (इष्टकाचयन) हैं॥ ३७॥

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—भुजज्योप०।

    (मुद्रित पृष्ठ 296)
  2. ४

    प्रा० पा०—प्रवस्यास्तव।

    (मुद्रित पृष्ठ 296)
  3. ५

    प्रा० पा०—अवरं ते।

    (मुद्रित पृष्ठ 296)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1883 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): द्रंष्ट्र: → दंष्ट्रः

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें