श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.13.38

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

सोमस्तु६ रेतः सवनान्यवस्थितिः

संस्थाविभेदास्तव देव धातवः।

सत्राणि सर्वाणि शरीरसन्धि-

स्त्वं सर्वयज्ञक्रतुरिष्टिबन्धनः॥ ३८

somastu retaḥ savanānyavasthitiḥ

saṃsthāvibhedāstava deva dhātavaḥ|

satrāṇi sarvāṇi śarīrasandhi-

stvaṃ sarvayajñakraturiṣṭibandhanaḥ|| 38

अर्थ

देव! आपका वीर्य सोम है; आसन (बैठना) प्रातःसवनादि तीन सवन हैं; सातों धातु अग्‍निष्टोम, अत्यग्‍निष्टोम, उक्थ, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र और आप्तोर्याम नामकी सात संस्थाएँ हैं तथा शरीरकी सन्धियाँ (जोड़) सम्पूर्ण सत्र हैं। इस प्रकार आप सम्पूर्ण यज्ञ (सोमरहित याग) और क्रतु (सोमसहित याग) रूप हैं। यज्ञानुष्ठानरूप इष्टियाँ आपके अंगोंको मिलाये रखनेवाली मांसपेशियाँ हैं॥ ३८॥

टिप्पणियाँ

  1. ६

    प्रा० पा०—सोमश्‍च।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 296)

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