श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.13.41

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

त्रयीमयं रूपमिदं च सौकरं

भूमण्डलेनाथ दता धृतेन ते।

चकास्ति शृङ्गोढघनेन भूयसा

कुलाचलेन्द्रस्य यथैव विभ्रमः॥ ४१

trayīmayaṃ rūpamidaṃ ca saukaraṃ

bhūmaṇḍalenātha datā dhṛtena te|

cakāsti śṛṅgoḍhaghanena bhūyasā

kulācalendrasya yathaiva vibhramaḥ|| 41

अर्थ

आपके दाँतोंपर रखे हुए भूमण्डलके सहित आपका यह वेदमय वराहविग्रह ऐसा सुशोभित हो रहा है, जैसे शिखरोंपर छायी हुई मेघमालासे कुलपर्वतकी शोभा होती है॥ ४१॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें