श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.13.42

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

संस्थापयैनां जगतां सतस्थुषां

लोकाय पत्नीमसि मातरं पिता।

विधेम चास्यै नमसा सह त्वया

यस्यां स्वतेजोऽग्‍निमिवारणावधाः॥ ४२

saṃsthāpayaināṃ jagatāṃ satasthuṣāṃ

lokāya patnīmasi mātaraṃ pitā|

vidhema cāsyai namasā saha tvayā

yasyāṃ svatejo'gnimivāraṇāvadhāḥ|| 42

अर्थ

नाथ! चराचर जीवोंके सुखपूर्वक रहनेके लिये आप अपनी पत्‍नी इन जगन्माता पृथ्वीको जलपर स्थापित कीजिये। आप जगत‍्के पिता हैं और अरणिमें अग्‍निस्थापनके समान आपने इसमें धारण शक्तिरूप अपना तेज स्थापित किया है। हम आपको और इस पृथ्वीमाताको प्रणाम करते हैं॥ ४२॥

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