श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.13.44

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

विधुन्वता वेदमयं निजं वपु-

र्जनस्तपःसत्यनिवासिनो वयम्।

सटाशिखोद्धूतशिवाम्बुबिन्दुभि-

र्विमृज्यमाना भृशमीश पाविताः॥ ४४

vidhunvatā vedamayaṃ nijaṃ vapu-

rjanastapaḥsatyanivāsino vayam|

saṭāśikhoddhūtaśivāmbubindubhi-

rvimṛjyamānā bhṛśamīśa pāvitāḥ|| 44

अर्थ

जब आप अपने वेदमय विग्रहको हिलाते हैं, तब हमारे ऊपर आपकी गरदनके बालोंसे झरती हुई शीतल जलकी बूँदें गिरती हैं। ईश! उनसे भीगकर हम जनलोक, तपलोक और सत्यलोकमें रहनेवाले मुनिजन सर्वथा पवित्र हो जाते हैं॥ ४४॥

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