जो पुरुष आपके कर्मोंका पार पाना चाहता है, अवश्य ही उसकी बुद्धि नष्ट हो गयी है; क्योंकि आपके कर्मोंका कोई पार ही नहीं है। आपकी ही योगमायाके सत्त्वादि गुणोंसे यह सारा जगत् मोहित हो रहा है। भगवन्! आप इसका कल्याण कीजिये॥ ४५॥
स वै बत भ्रष्टमतिस्तवैष ते
यः कर्मणां पारमपारकर्मणः।
यद्योगमायागुणयोगमोहितं
विश्वं समस्तं भगवन् विधेहि शम्॥ ४५
जो पुरुष आपके कर्मोंका पार पाना चाहता है, अवश्य ही उसकी बुद्धि नष्ट हो गयी है; क्योंकि आपके कर्मोंका कोई पार ही नहीं है। आपकी ही योगमायाके सत्त्वादि गुणोंसे यह सारा जगत् मोहित हो रहा है। भगवन्! आप इसका कल्याण कीजिये॥ ४५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.13.45 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 297) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/13/45/