श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.15.24

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

येऽभ्य२र्थितामपि च नो नृगतिं प्रपन्‍ना

ज्ञानं च तत्त्वविषयं सहधर्म यत्र।

नाराधनं भगवतो वितरन्त्यमुष्य

सम्मोहिता विततया बत३ मायया ते॥ २४

ye'bhyarthitāmapi ca no nṛgatiṃ prapannā

jñānaṃ ca tattvaviṣayaṃ sahadharma yatra|

nārādhanaṃ bhagavato vitarantyamuṣya

sammohitā vitatayā bata māyayā te|| 24

अर्थ

अहा! इस मनुष्ययोनिकी बड़ी महिमा है, हम देवतालोग भी इसकी चाह करते हैं। इसीमें तत्त्वज्ञान और धर्मकी भी प्राप्ति हो सकती है। इसे पाकर भी जो लोग भगवान्‌की आराधना नहीं करते, वे वास्तवमें उनकी सर्वत्र फैली हुई मायासे ही मोहित हैं॥ २४॥✎ 261 262 1307 1308

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—ऽभ्यर्चिता०।

    (मुद्रित पृष्ठ 307)
  2. ३

    प्रा० पा०—ननु।

    (मुद्रित पृष्ठ 307)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #261 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #262 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1307 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): वैकुण्ठ-लोकमें → वैकुण्ठलोकमें
  • #1308 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: प्रति-बिम्ब → प्रतिबिम्ब

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