श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.15.25

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

यच्च व्रजन्त्यनिमिषामृषभानुवृत्त्या

दूरेयमा ह्युपरि नः स्पृहणीयशीलाः।

भर्तुर्मिथः सुयशसः कथनानुराग-

वैक्लव्यबाष्पकलया पुलकीकृताङ्गाः॥ २५

yacca vrajantyanimiṣāmṛṣabhānuvṛttyā

dūreyamā hyupari naḥ spṛhaṇīyaśīlāḥ|

bharturmithaḥ suyaśasaḥ kathanānurāga-

vaiklavyabāṣpakalayā pulakīkṛtāṅgāḥ|| 25

अर्थ

देवाधिदेव श्रीहरिका निरन्तर चिन्तन करते रहनेके कारण जिनसे यमराज दूर रहते हैं, आपसमें प्रभुके सुयशकी चर्चा चलनेपर अनुरागजन्य विह्वलतावश जिनके नेत्रोंसे अविरल अश्रुधारा बहने लगती है तथा शरीरमें रोमांच हो जाता है और जिनके-से शील स्वभावकी हमलोग भी इच्छा करते हैं—वे परमभागवत ही हमारे लोकोंसे ऊपर उस वैकुण्ठधाममें जाते हैं॥ २५॥✎ 261 262 1307 1308

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #261 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #262 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1307 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): वैकुण्ठ-लोकमें → वैकुण्ठलोकमें
  • #1308 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: प्रति-बिम्ब → प्रतिबिम्ब

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