श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.15.4

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

देवदेव जगद्धातर्लोकनाथशिखामणे२।

परेषामपरेषां त्वं भूतानामसि भाववित्॥ ४

devadeva jagaddhātarlokanāthaśikhāmaṇe|

pareṣāmapareṣāṃ tvaṃ bhūtānāmasi bhāvavit|| 4

अर्थ

देवाधिदेव! आप जगत‍्के रचयिता और समस्त लोकपालोंके मुकुटमणि हैं। आप छोटे-बड़े सभी जीवोंका भाव जानते हैं॥ ४॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—शिरोमणे।

    (मुद्रित पृष्ठ 304)

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें