श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.15.40

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

पीतांशुके पृथुनितम्बिनि विस्फुरन्त्या

काञ्च्यालिभिर्विरुतया वनमालया च।

वल्गुप्रकोष्ठवलयं विनतासुतांसे

विन्यस्तहस्तमितरेण धुनानमब्जम्॥ ४०

pītāṃśuke pṛthunitambini visphurantyā

kāñcyālibhirvirutayā vanamālayā ca|

valguprakoṣṭhavalayaṃ vinatāsutāṃse

vinyastahastamitareṇa dhunānamabjam|| 40

अर्थ

उनके पीताम्बरमण्डित विशाल नितम्बोंपर झिलमिलाती हुई करधनी और गलेमें भ्रमरोंसे मुखरित वनमाला विराज रही थी; तथा वे कलाइयोंमें सुन्दर कंगन पहने अपना एक हाथ गरुड़जीके कंधेपर रख दूसरेसे कमलका पुष्प घुमा रहे थे॥ ४०॥

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