॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.15.41
विद्युत्क्षिपन्मकरकुण्डलमण्डनार्ह-
गण्डस्थलोन्नसमुखं मणिमत्किरीटम्।
दोर्दण्डषण्डविवरे हरता परार्घ्य-
हारेण कन्धरगतेन च कौस्तुभेन॥ ४१
vidyutkṣipanmakarakuṇḍalamaṇḍanārha-
gaṇḍasthalonnasamukhaṃ maṇimatkirīṭam|
dordaṇḍaṣaṇḍavivare haratā parārghya-
hāreṇa kandharagatena ca kaustubhena|| 41
अर्थ
उनके अमोल कपोल बिजलीकी प्रभाको भी लजानेवाले मकराकृत कुण्डलोंकी शोभा बढ़ा रहे थे, उभरी हुई सुघड़ नासिका थी, बड़ा ही सुन्दर मुख था, सिरपर मणिमय मुकुट विराजमान था तथा चारों भुजाओंके बीच महामूल्यवान् मनोहर हारकी और गलेमें कौस्तुभमणिकी अपूर्व शोभा थी॥ ४१॥