श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.15.6

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

ये त्वानन्येन३ भावेन भावयन्त्यात्मभावनम्।

आत्मनि प्रोतभुवनं परं सदसदात्मकम्॥ ६

ye tvānanyena bhāvena bhāvayantyātmabhāvanam|

ātmani protabhuvanaṃ paraṃ sadasadātmakam|| 6

अर्थ

आपमें सम्पूर्ण भुवन स्थित हैं, कार्य-कारणरूप सारा प्रपंच आपका शरीर है; किन्तु वास्तवमें आप इससे परे हैं। जो समस्त जीवोंके उत्पत्तिस्थान आपका अनन्यभावसे ध्यान करते हैं, उन सिद्ध योगियोंका किसी प्रकार भी ह्रास नहीं हो सकता; क्योंकि वे आपके कृपाकटाक्षसे कृतकृत्य हो जाते हैं तथा प्राण, इन्द्रिय और मनको जीत लेनेके कारण उनका योग भी परिपक्‍व हो जाता है॥ ६-७॥

यह अर्थ श्लोक 6–7 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—ये त्वामनन्यभावेन।

    (मुद्रित पृष्ठ 304)

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