भगवान्की इस अद्भुत उदारताको देखकर वे बहुत आनन्दित हुए और उनका अंग-अंग पुलकित हो गया। फिर योगमायाके प्रभावसे अपने परम ऐश्वर्यका प्रभाव प्रकट करनेवाले प्रभुसे वे हाथ जोड़कर कहने लगे॥ १५॥✎ 268
ते योगमाययाऽऽरब्धपारमेष्ठ्यमहोदयम्।
प्रोचुः प्राञ्जलयो विप्राः प्रहृष्टाः क्षुभितत्वचः॥ १५
भगवान्की इस अद्भुत उदारताको देखकर वे बहुत आनन्दित हुए और उनका अंग-अंग पुलकित हो गया। फिर योगमायाके प्रभावसे अपने परम ऐश्वर्यका प्रभाव प्रकट करनेवाले प्रभुसे वे हाथ जोड़कर कहने लगे॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.16.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 314) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/16/15/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)