श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.16.33

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

तौ तु गीर्वाणऋषभौ दुस्तराद्धरिलोकतः।

हतश्रियौ ब्रह्मशापादभूतां विगतस्मयौ॥ ३३

tau tu gīrvāṇaṛṣabhau dustarāddharilokataḥ|

hataśriyau brahmaśāpādabhūtāṃ vigatasmayau|| 33

अर्थ

वे देवश्रेष्ठ जय-विजय तो ब्रह्म-शापके कारण उस अलंघनीय भगवद्धाममें ही श्रीहीन हो गये तथा उनका सारा गर्व गलित हो गया॥ ३३॥✎ 270 271

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #270 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #271 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें