श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.17.27

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

तत्रोपलभ्यासुरलोकपालकं

यादोगणानामृषभं प्रचेतसम्।

स्मयन् प्रलब्धुं प्रणिपत्य नीचव-

ज्जगाद मे देह्यधिराज संयुगम्॥ २७

tatropalabhyāsuralokapālakaṃ

yādogaṇānāmṛṣabhaṃ pracetasam|

smayan pralabdhuṃ praṇipatya nīcava-

jjagāda me dehyadhirāja saṃyugam|| 27

अर्थ

वहाँ पाताललोकके स्वामी, जलचरोंके अधिपति वरुणजीको देखकर उसने उनकी हँसी उड़ाते हुए नीच मनुष्यकी भाँति प्रणाम किया और कुछ मुसकराते हुए व्यंगसे कहा—‘महाराज! मुझे युद्धकी भिक्षा दीजिये॥ २७॥

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