वहाँ पाताललोकके स्वामी, जलचरोंके अधिपति वरुणजीको देखकर उसने उनकी हँसी उड़ाते हुए नीच मनुष्यकी भाँति प्रणाम किया और कुछ मुसकराते हुए व्यंगसे कहा—‘महाराज! मुझे युद्धकी भिक्षा दीजिये॥ २७॥
तत्रोपलभ्यासुरलोकपालकं
यादोगणानामृषभं प्रचेतसम्।
स्मयन् प्रलब्धुं प्रणिपत्य नीचव-
ज्जगाद मे देह्यधिराज संयुगम्॥ २७
वहाँ पाताललोकके स्वामी, जलचरोंके अधिपति वरुणजीको देखकर उसने उनकी हँसी उड़ाते हुए नीच मनुष्यकी भाँति प्रणाम किया और कुछ मुसकराते हुए व्यंगसे कहा—‘महाराज! मुझे युद्धकी भिक्षा दीजिये॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.17.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 320) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/17/27/