श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.17.28

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

त्वं लोकपालोऽधिपतिर्बृहच्छ्रवा

वीर्यापहो दुर्मदवीरमानिनाम्।

विजित्य लोकेऽखिलदैत्यदानवान्

यद्राजसूयेन पुरायजत्प्रभो॥ २८

tvaṃ lokapālo'dhipatirbṛhacchravā

vīryāpaho durmadavīramāninām|

vijitya loke'khiladaityadānavān

yadrājasūyena purāyajatprabho|| 28

अर्थ

फिर वह महाबली दैत्य वहाँसे लौटकर जलक्रीडा करनेके लिये मतवाले हाथीके समान गहरे समुद्रमें घुस गया, जिसमें लहरोंकी बड़ी भयंकर गर्जना हो रही थी॥ २४॥ ज्यों ही उसने समुद्रमें पैर रखा कि डरके मारे वरुणके सैनिक जलचर जीव हकबका गये और किसी प्रकारकी छेड़छाड़ न करनेपर भी वे उसकी धाकसे ही घबराकर बहुत दूर भाग गये॥ २५॥ महाबली हिरण्याक्ष अनेक वर्षोंतक समुद्रमें ही घूमता और सामने किसी प्रतिपक्षीको न पाकर बार-बार वायुवेगसे उठी हुई उसकी प्रचण्ड तरंगोंपर ही अपनी लोहमयी गदाको आजमाता रहा। इस प्रकार घूमते-घूमते वह वरुणकी राजधानी विभावरीपुरीमें जा पहुँचा॥ २६॥ वहाँ पाताललोकके स्वामी, जलचरोंके अधिपति वरुणजीको देखकर उसने उनकी हँसी उड़ाते हुए नीच मनुष्यकी भाँति प्रणाम किया और कुछ मुसकराते हुए व्यंगसे कहा—‘महाराज! मुझे युद्धकी भिक्षा दीजिये॥ २७॥ प्रभो! आप तो लोक-पालक, राजा और बड़े कीर्तिशाली हैं। जो लोग अपनेको बाँका वीर समझते थे, उनके वीर्यमदको भी आप चूर्ण कर चुके हैं और पहले एक बार आपने संसारके समस्त दैत्य-दानवोंको जीतकर राजसूययज्ञ भी किया था’॥ २८॥

यह व्याख्या श्लोक 3.17.24 से 3.17.28 तककी एक साथ है।

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