उस मदोन्मत्त शत्रुके इस प्रकार बहुत उपहास करनेसे भगवान् वरुणको क्रोध तो बहुत आया, किंतु अपने बुद्धिबलसे वे उसे पी गये और बदलेमें उससे कहने लगे—‘भाई! हमें तो अब युद्धादिका कोई चाव नहीं रह गया है॥ २९॥
स एवमुत्सिक्तमदेन विद्विषा
दृढं प्रलब्धो भगवानपां पतिः।
रोषं समुत्थं शमयन् स्वया धिया
व्यवोचदङ्गोपशमं गता वयम्॥ २९
उस मदोन्मत्त शत्रुके इस प्रकार बहुत उपहास करनेसे भगवान् वरुणको क्रोध तो बहुत आया, किंतु अपने बुद्धिबलसे वे उसे पी गये और बदलेमें उससे कहने लगे—‘भाई! हमें तो अब युद्धादिका कोई चाव नहीं रह गया है॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.17.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 320) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/17/29/