श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.17.30

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

पश्यामि नान्यं पुरुषात्पुरातनाद्

यः संयुगे त्वां रणमार्गकोविदम्।

आराधयिष्यत्यसुरर्षभेहि तं

मनस्विनो यं गृणते भवादृशाः॥ ३०

paśyāmi nānyaṃ puruṣātpurātanād

yaḥ saṃyuge tvāṃ raṇamārgakovidam|

ārādhayiṣyatyasurarṣabhehi taṃ

manasvino yaṃ gṛṇate bhavādṛśāḥ|| 30

अर्थ

भगवान् पुराणपुरुषके सिवा हमें और कोई ऐसा दीखता भी नहीं जो तुम-जैसे रणकुशल वीरको युद्धमें सन्तुष्ट कर सके। दैत्यराज! तुम उन्हींके पास जाओ, वे ही तुम्हारी कामना पूरी करेंगे। तुम-जैसे वीर उन्हींका गुणगान किया करते हैं॥ ३०॥

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