फिर जब वह क्रोधसे होठ चबाता अपनी गदा लेकर बार-बार घुमाने लगा, तब श्रीहरि कुपित होकर बड़े वेगसे उसकी ओर झपटे॥ १६॥✎ 279
पुनर्गदां स्वामादाय भ्रामयन्तमभीक्ष्णशः।
अभ्यधावद्धरिः क्रुद्धः संरम्भाद्दष्टदच्छदम्॥ १६
फिर जब वह क्रोधसे होठ चबाता अपनी गदा लेकर बार-बार घुमाने लगा, तब श्रीहरि कुपित होकर बड़े वेगसे उसकी ओर झपटे॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.18.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 323) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/18/16/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)