सौम्यस्वभाव विदुरजी! तब प्रभुने शत्रुकी दायीं भौंहपर गदाकी चोट की, किन्तु गदायुद्धमें कुशल हिरण्याक्षने उसे बीचमें ही अपनी गदापर ले लिया॥ १७॥✎ 279
ततश्च गदयारातिं दक्षिणस्यां भ्रुवि प्रभुः।
आजघ्ने स तु तां सौम्य गदया कोविदोऽहनत्॥ १७
सौम्यस्वभाव विदुरजी! तब प्रभुने शत्रुकी दायीं भौंहपर गदाकी चोट की, किन्तु गदायुद्धमें कुशल हिरण्याक्षने उसे बीचमें ही अपनी गदापर ले लिया॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.18.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 323) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/18/17/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)