॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.19.10
आह चायुधमाधत्स्व घटस्व त्वं जिगीषसि।
इत्युक्तः स तदा भूयस्ताडयन् व्यनदद् भृशम्॥ १०
āha cāyudhamādhatsva ghaṭasva tvaṃ jigīṣasi|
ityuktaḥ sa tadā bhūyastāḍayan vyanadad bhṛśam|| 10
अर्थ
साधुस्वभाव विदुरजी! यज्ञमूर्ति श्रीवराहभगवान्ने शत्रुके देखते-देखते लीलासे ही अपने बायें पैरसे उसकी वह वायुके समान वेगवाली गदा पृथ्वीपर गिरा दी और उससे कहा, ‘अरे दैत्य! तू मुझे जीतना चाहता है, इसलिये अपना शस्त्र उठा ले और एक बार फिर वार कर।’ भगवान्के इस प्रकार कहनेपर उसने फिर गदा चलायी और बड़ी भीषण गर्जना करने लगा॥ ९-१०॥✎ 282 283 284