अपने उद्यमको इस प्रकार व्यर्थ हुआ देख उस महादैत्यका घमंड ठंडा पड़ गया और उसका तेज नष्ट हो गया। अबकी बार भगवान्के देनेपर उसने उस गदाको लेना न चाहा॥ १२॥✎ 285
स्वपौरुषे प्रतिहते हतमानो महासुरः।
नैच्छद्गदां दीयमानां हरिणा विगतप्रभः॥ १२
अपने उद्यमको इस प्रकार व्यर्थ हुआ देख उस महादैत्यका घमंड ठंडा पड़ गया और उसका तेज नष्ट हो गया। अबकी बार भगवान्के देनेपर उसने उस गदाको लेना न चाहा॥ १२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.19.12 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 325) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/19/12/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)