॥ श्रीहरिः ॥
इति कौषारवाख्यातामाश्रुत्य भगवत्कथाम्।
क्षत्ताऽऽनन्दं परं लेभे महाभागवतो द्विज॥ ३३
iti kauṣāravākhyātāmāśrutya bhagavatkathām|
kṣattā''nandaṃ paraṃ lebhe mahābhāgavato dvija|| 33
अर्थ
सूतजी कहते हैं—शौनकजी! मैत्रेयजीके मुखसे भगवान्की यह कथा सुनकर परम भागवत विदुरजीको बड़ा आनन्द हुआ॥ ३३॥✎ 289 290
इति कौषारवाख्यातामाश्रुत्य भगवत्कथाम्।
क्षत्ताऽऽनन्दं परं लेभे महाभागवतो द्विज॥ ३३
सूतजी कहते हैं—शौनकजी! मैत्रेयजीके मुखसे भगवान्की यह कथा सुनकर परम भागवत विदुरजीको बड़ा आनन्द हुआ॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.19.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 328) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/19/33/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
- #289 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की
- #290 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की