श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.2.14

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

यस्यानुरागप्लुतहासरास-

लीलावलोकप्रतिलब्धमानाः ।

व्रजस्त्रियो दृग्भिरनुप्रवृत्त-

धियोऽवतस्थुः किल कृत्यशेषाः॥ १४

yasyānurāgaplutahāsarāsa-

līlāvalokapratilabdhamānāḥ |

vrajastriyo dṛgbhiranupravṛtta-

dhiyo'vatasthuḥ kila kṛtyaśeṣāḥ|| 14

अर्थ

उनके प्रेमपूर्ण हास्य-विनोद और लीलामय चितवनसे सम्मानित होनेपर व्रजबालाओंकी आँखें उन्हींकी ओर लग जाती थीं और उनका चित्त भी ऐसा तल्लीन हो जाता था कि वे घरके काम-धंधोंको अधूरा ही छोड़कर जड पुतलियोंकी तरह खड़ी रह जाती थीं॥ १४॥✎ 193

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #193 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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