चराचर जगत् और प्रकृतिके स्वामी भगवान्ने जब अपने शान्तरूप महात्माओंको अपने ही घोररूप असुरोंसे सताये जाते देखा, तब वे करुणाभावसे द्रवित हो गये और अजन्मा होनेपर भी अपने अंश बलरामजीके साथ काष्ठमें अग्निके समान प्रकट हुए॥ १५॥✎ 193
स्वशान्तरूपेष्वितरैः स्वरूपै-
रभ्यर्द्यमानेष्वनुकम्पितात्मा ।
परावरेशो महदंशयुक्तो
ह्यजोऽपि जातो भगवान् यथाग्निः॥ १५
चराचर जगत् और प्रकृतिके स्वामी भगवान्ने जब अपने शान्तरूप महात्माओंको अपने ही घोररूप असुरोंसे सताये जाते देखा, तब वे करुणाभावसे द्रवित हो गये और अजन्मा होनेपर भी अपने अंश बलरामजीके साथ काष्ठमें अग्निके समान प्रकट हुए॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.2.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 243) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/2/15/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)