श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.2.15

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

स्वशान्तरूपेष्वितरैः स्वरूपै-

रभ्यर्द्यमानेष्वनुकम्पितात्मा ।

परावरेशो महदंशयुक्तो

ह्यजोऽपि जातो भगवान् यथाग्‍निः॥ १५

svaśāntarūpeṣvitaraiḥ svarūpai-

rabhyardyamāneṣvanukampitātmā |

parāvareśo mahadaṃśayukto

hyajo'pi jāto bhagavān yathāgniḥ|| 15

अर्थ

चराचर जगत् और प्रकृतिके स्वामी भगवान्‌ने जब अपने शान्तरूप महात्माओंको अपने ही घोररूप असुरोंसे सताये जाते देखा, तब वे करुणाभावसे द्रवित हो गये और अजन्मा होनेपर भी अपने अंश बलरामजीके साथ काष्ठमें अग्‍निके समान प्रकट हुए॥ १५॥✎ 193

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #193 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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