श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.2.8

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

दुर्भगो बत लोकोऽयं यदवो नितरामपि।

ये संवसन्तो न विदुर्हरिं मीना इवोडुपम्॥ ८

durbhago bata loko'yaṃ yadavo nitarāmapi|

ye saṃvasanto na vidurhariṃ mīnā ivoḍupam|| 8

अर्थ

ओह! यह मनुष्यलोक बड़ा ही अभागा है; इसमें भी यादव तो नितान्त भाग्यहीन हैं, जिन्होंने निरन्तर श्रीकृष्णके साथ रहते हुए भी उन्हें नहीं पहचाना—जिस तरह अमृतमय चन्द्रमाके समुद्रमें रहते समय मछलियाँ उन्हें नहीं पहचान सकी थीं॥ ८॥✎ 191 192

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #191 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #192 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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