श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.2.9

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

इङ्गितज्ञाः पुरुप्रौढा एकारामाश्‍च सात्वताः।

सात्वतामृषभं सर्वे भूतावासममंसत॥ ९

iṅgitajñāḥ puruprauḍhā ekārāmāśca sātvatāḥ|

sātvatāmṛṣabhaṃ sarve bhūtāvāsamamaṃsata|| 9

अर्थ

यादवलोग मनके भावको ताड़नेवाले, बड़े समझदार और भगवान्‌के साथ एक ही स्थानमें रहकर क्रीडा करनेवाले थे; तो भी उन सबने समस्त विश्‍वके आश्रय, सर्वान्तर्यामी श्रीकृष्णको एक श्रेष्ठ यादव ही समझा॥ ९॥✎ 191 192

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #191 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #192 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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