‘सुन्दरि! तुम कौन हो और किसकी पुत्री हो? भामिनि! यहाँ तुम्हारे आनेका क्या प्रयोजन है? तुम अपने अनूप रूपका यह बेमोल सौदा दिखाकर हम अभागोंको क्यों तरसा रही हो॥ ३४॥
कासि कस्यासि रम्भोरु को वार्थस्तेऽत्र भामिनि।
रूपद्रविणपण्येन दुर्भगान्नो विबाधसे॥ ३४
‘सुन्दरि! तुम कौन हो और किसकी पुत्री हो? भामिनि! यहाँ तुम्हारे आनेका क्या प्रयोजन है? तुम अपने अनूप रूपका यह बेमोल सौदा दिखाकर हम अभागोंको क्यों तरसा रही हो॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.20.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 332) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/20/34/